कैसा होगा?


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तुझको खो कर फिर से पाना कैसा होगा,
दिल में फिर से आग लगाना कैसा होगा?
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कितनी सारी बातें हैं तुझसे कहने की,
तुझसे मिलके चुप हो जाना कैसा होगा?
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कितनी मुश्किल से दुनिया में घुल पाया था,
अब तुजमे फिर खो जाना कैसा होगा?
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रफ्ता-रफ्ता मर-मर के तुझको भूला था,
याद में तेरी फिर जी जाना कैसा होगा?
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जिस पन्ने पर मैंने खुद को छोड़ दिया था,
उस पन्ने का फिर खुल जाना कैसा होगा?
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ना कोई रिश्ता था तुमसे, ना बंधन था नाम का,
फिर से रिश्तों का सैलाब आना कैसा होगा?
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– अज्ञात

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