चाहता हूँ विशवास…

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सिंदूर बन के तुम्हारे सिर पर
सवार नहीं होना चाहता हूँ.
न बीछूआ बनकर डंस लेना चाहता हूँ.
तुम्हारे कदमो की उड़ान,
चूड़ीयो की जंजीर मे नहीं जकडना चाहता.
तुम्हारी क्लाइओ की लय
न मंगल सूत्र बन जूका देना चाहता हूँ.
तुम्हारी उन्नत ग्रीवा –
किसी वचन की बर्फ़ मे,
नहीं सोखना चाहता, तुम्हारी देह का ताप.
बस आँखों से –
बीजना चाहता हूँ विशवास…
और दाखील हो जाना चाहता हूँ…
खामोशी से तुम्हारी दुनियामे…
जैसे आँखों मे दाखील हो जाती हें नींद,
जैसे नींद मे दाखील हो जाते हें स्वपन,
जैसे स्वपन मे दाखील हो जाती हें बैचेनी,
जैसे बैचेनी मे दाखील हो जाती हें उम्मीदे…!!!

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– अशोक पांडे

 

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