सोचता हूँ.


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ज़िंदगी की सोचता हूँ ना ज़माने की सोचता हूँ,
मैं तो बस उसे अपना बनाने की सोचता हूँ.
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उसके रूठ जाने के अंदाज़ की कसम,
वो रूठ जाये तो मनाने की सोचता हूँ.
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उसने ना की वफ़ा तो कोई गिला नहीं,
मैं उससे वफ़ा निभाने की सोचता हूँ.
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वो मुझे रुलाये तो कोई ग़म नहीं,
मैं रो कर भी उसे हँसाने की सोचता हूँ.
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वो ढाये लाख ज़ुल्म ही सही मुझपे -और मैं,
अपने इरादे मुकम्मिल करने की सोचता हूँ.
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नकाब उठाया उसने क़त्ल करने के इरादे से,
नज़र ना लगे मेरी – उसे कम देखने की सोचता हूँ.
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एहसान अपने गिनवाते रहे वो मुझे उंगलियों पर,
उनके बेहिसाब सितम पर चुप रहने की सोचता हूँ.
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छोड़ गए मुझे वो अकेला इस अन्जानी भीड़ में,
मैं उनसे उनकी तन्हाईयों में मिलने की सोचता हूँ.
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क्रिश्ना

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