नज़र में मत रख…

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बीते हुए दिनों का साया नज़र में मत रख,
एक अजनबी को ऐसे तन्हा नगर में मत रख.
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तुझको ही वरना इक दिन खा जायेंगे अंधेरे,
सूरज को कैद कर के अपने ही घर में मत रख.
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हसरत, तमन्ना, इशरत; उम्मीद, आस, निस्बत,
सामान इतना ज़ियादा छोटे सफ़र में मत रख.
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हर इन्कलाबी जज़्बा अपने अमल में ले आ,
महदूद इसको अपने दिल में, जिगर में मत रख.
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ये जान ले तू अब तो, फूलों की है तलब तो,
इसकी डगर के कांटे उस की डगर में मत रख.
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– हर्ष ब्रह्मभट्ट

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