सहारे नहीं है…

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नदी है, भंवर है, किनारे नहीं है,
अलम है, सितम है, सहारे नहीं है.
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कई रिश्ते-नाते है दुनिया में लेकिन,
हमारे नहीं है, तुम्हारे नहीं है.
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वो दिन ज़िंदगी भर गुज़ारे है हमने,
जो दिन तुमने अब तक गुज़ारे नहीं है.
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न छोड़ी कभी हमने खुद्दारी अपनी,
कभी हाथ हमने पसारे नहीं है.
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मुक़द्दर को रखते है ठोकर में अपनी,
मुक़द्दर के राजा है, मारे नहीं है!
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ये उलझी लटों से पता चल रहा है,
कई दिन से गेसू सँवारे नहीं है.
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तेरे ग़म से कम दर्द है खंजरों का,
यूँ ही दिल में इन को उतारे नहीं है.
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जहां भर के सब लोग है हमको प्यारे,
मगर हम किसी के भी प्यारे नहीं है.
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ये है खेल कैसा कि हम जिस में अब तक,
कोई दाव जीते या हारे नहीं है!
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– हर्ष ब्रह्मभट्ट

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