हँसते रहे…


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हर तरफ दुनिया के सारे रंजोगम हँसते रहे,
बेतहाशा खिल खिलाकर उनपे हम हँसते रहे.
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हम इधर थे मुंतजीर और थी मेरी मंजिल उधर,
बीच में लंबे सफ़र के पेचोखम हँसते रहे.
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हम ज़मानेभर का पि के ज़हर पत्थर हो गए,
पर जिन्हें हमने तराशा वो सनम हँसते रहे.
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मैं दोरंगेपन पे दुनिया के हँसा था कल यहाँ,
सोचकर क्या आप लेकिन मोहतरम हँसते रहे?
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हम ज़मीन के चाँद तारों में रहे मशरुफ्फ़ यूं,
आसमान के चाँद तारें बेरहम हँसते रहे.
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हमने जैसे ही कलम की नोक कागज़ पर रखी,
हम इधर रोते रहे, कागज़ कलम हँसते रहे.
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– क्रिश्ना

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