याद…


रूह को तडपा रही है उन की याद,
दर्द बन कर छा रही है उन की याद.

इश्क से घबरा रही है उन की याद,
रुकते रुकते आ रही है उन की याद.

वो हँसे, वो जेर-ए-लब कुछ कह उठे,
ख्वाब से दिखला रही है उन की याद.

मैं तो खुद्दारी का कायल हूँ मगर,
क्या करू फिर आ रही है उन की याद.

अब खायाल-ए-तर्क-ए-रब्त-जब्त ही से है,
खुद-ब-खुद शर्मा रही है उन की याद.

– शकील

रूह=आत्मा,

इश्क=प्रेम,

जेर-ए-लब=होंठों होंठों में,

ख्वाब=स्वप्न,

खुद्दारी=गर्व,

कायल=माननेवाला,

रब्त=मित्रता तोड़ने का विचार,

जब्त=बर्दाश्त,

खुद-ब-खुद=अपने आप.

Advertisements

One thought on “याद…

  1. આમ તો બધા જ શેર લાજવાબ છે. પણ
    ,
    “मैं तो खुद्दारी का कायल हूँ मगर,
    क्या करू फिर आ रही है उन की याद.”- આ શેર વધારે ગમ્યો.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s