अहम ब्रह्मास्मी.


मुझ में शिव है, मुझ में ब्रह्मा, मुझ में विष्णु, मुझ में क्रिश्ना…
फिर में काहे मंदिर जाऊ?

धरती अंबर परबत सागर, में जित देखू उसको पाऊ…
फिर में काहे मंदिर जाऊ?
ये श्रृष्टि उसका सपना, हर व्यक्ति उसका अपना,
मधुबन को जो पाना है, प्रेम की ही माला जपना,
सांस सांस हर धड़कन धड़कन – प्रेम गीत ही गाता जाऊ,
फिर में काहे मंदिरे जाऊ?

सुंदर बंसी का लहरा, राधा तोड़े हर पहरा…
जमुनाजी के पार चली, रोके लाख भंवर गहरा,
राधा ने जो रूप लिया था, आज अगर मैं वो अपनाऊ,
फिर में काहे मंदिर जाऊ?

(अज्ञात )

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7 thoughts on “अहम ब्रह्मास्मी.

  1. ખૂબ સરસ પોસ્ટ. ઈશ્વરને મંદિરની સીમામાં બાંધી રાખવાને બદલે સમષ્ટિમાં જોવાનો પ્રયાસ સાચો છે.

  2. मुझ में शिव है, मुझ में ब्रह्मा, मुझ में विष्णु, मुझ में क्रिश्ना…
    फिर में काहे मंदिर जाऊ? nice 1 dear,
    hume aap ka blog bahoot pasnd aaya sundar he..! aap ko dher sari shubhkamna..! best of luck !

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