हिन्दी गझल


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ज़िंदगी की सोचता हूँ ना ज़माने की सोचता हूँ,
मैं तो बस उसे अपना बनाने की सोचता हूँ.
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उसके रूठ जाने के अंदाज़ की कसम,
वो रूठ जाये तो मनाने की सोचता हूँ.
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उसने ना की वफ़ा तो कोई गिला नहीं,
मैं उससे वफ़ा निभाने की सोचता हूँ.
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वो मुझे रुलाये तो कोई ग़म नहीं,
मैं रो कर भी उसे हँसाने की सोचता हूँ.
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वो ढाये लाख ज़ुल्म ही सही मुझपे -और मैं,
अपने इरादे मुकम्मिल करने की सोचता हूँ.
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नकाब उठाया उसने क़त्ल करने के इरादे से,
नज़र ना लगे मेरी – उसे कम देखने की सोचता हूँ.
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एहसान अपने गिनवाते रहे वो मुझे उंगलियों पर,
उनके बेहिसाब सितम पर चुप रहने की सोचता हूँ.
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छोड़ गए मुझे वो अकेला इस अन्जानी भीड़ में,
मैं उनसे उनकी तन्हाईयों में मिलने की सोचता हूँ.
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क्रिश्ना

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बीते हुए दिनों का साया नज़र में मत रख,
एक अजनबी को ऐसे तन्हा नगर में मत रख.
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तुझको ही वरना इक दिन खा जायेंगे अंधेरे,
सूरज को कैद कर के अपने ही घर में मत रख.
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हसरत, तमन्ना, इशरत; उम्मीद, आस, निस्बत,
सामान इतना ज़ियादा छोटे सफ़र में मत रख.
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हर इन्कलाबी जज़्बा अपने अमल में ले आ,
महदूद इसको अपने दिल में, जिगर में मत रख.
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ये जान ले तू अब तो, फूलों की है तलब तो,
इसकी डगर के कांटे उस की डगर में मत रख.
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- हर्ष ब्रह्मभट्ट

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नदी है, भंवर है, किनारे नहीं है,
अलम है, सितम है, सहारे नहीं है.
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कई रिश्ते-नाते है दुनिया में लेकिन,
हमारे नहीं है, तुम्हारे नहीं है.
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वो दिन ज़िंदगी भर गुज़ारे है हमने,
जो दिन तुमने अब तक गुज़ारे नहीं है.
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न छोड़ी कभी हमने खुद्दारी अपनी,
कभी हाथ हमने पसारे नहीं है.
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मुक़द्दर को रखते है ठोकर में अपनी,
मुक़द्दर के राजा है, मारे नहीं है!
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ये उलझी लटों से पता चल रहा है,
कई दिन से गेसू सँवारे नहीं है.
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तेरे ग़म से कम दर्द है खंजरों का,
यूँ ही दिल में इन को उतारे नहीं है.
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जहां भर के सब लोग है हमको प्यारे,
मगर हम किसी के भी प्यारे नहीं है.
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ये है खेल कैसा कि हम जिस में अब तक,
कोई दाव जीते या हारे नहीं है!
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- हर्ष ब्रह्मभट्ट

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